शंकराचार्य विवाद पर केशव प्रसाद मौर्य की समझदारी: राजनीति में संतुलन की मिसाल”
शंकराचार्य जी का विचार, केशव प्रसाद मौर्य की समझदारी और ‘कालनेमी’ पर योगी सरकार से सवाल
हाल ही में शंकराचार्य जी से जुड़े विवाद पर उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम श्री केशव प्रसाद मौर्य जी का बयान सामने आया कि
“शंकराचार्य जी को सम्मान देकर इस विवाद का पटाक्षेप किया जाना चाहिए।”
यह बयान स्वागतयोग्य है।
कम से कम शासन-प्रशासन के किसी जिम्मेदार व्यक्ति ने यह तो सोचा कि यह विवाद बढ़ाने योग्य नहीं, बल्कि समाप्त करने योग्य है।
आज के समय में, जब संस्थाएँ और प्राधिकरण अक्सर विवाद को हवा देने का काम करते हैं, वहाँ मौर्य जी का यह कहना एक राजनीतिक परिपक्वता का संकेत देता है।
लेकिन एक अधूरा पक्ष भी है…
डिप्टी सीएम ने सम्मान की बात तो की,
लेकिन उस मानहानि पर कुछ नहीं कहा जो शंकराचार्य जी की:
मुख्यमंत्री स्तर से
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और मेला प्राधिकरण जैसे संवैधानिक निकायों द्वारा
की गई बताई जा रही है।
यदि वास्तव में सनातन परंपरा के शीर्ष आचार्य के साथ अन्याय हुआ है, तो केवल सम्मान की बात नहीं,
बल्कि स्पष्ट खेद और सुधारात्मक कदम भी अपेक्षित हैं।
शंकराचार्य जी का ‘कालनेमी’ संदर्भ: केवल आरोप नहीं, चेतावनी
शंकराचार्य जी द्वारा ‘कालनेमी’ शब्द का प्रयोग कोई सामान्य टिप्पणी नहीं है।
रामायण में कालनेमी:
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एक राक्षस था
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जिसने साधु का वेश धारण किया
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और धर्म का दिखावा करके कपट फैलाया।
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खुद को धर्म का रक्षक बताता हो
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हिंदुओं से धर्म के नाम पर वोट ले
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लेकिन अपने वादों पर खरा न उतरे
तो उस पर ‘कालनेमी’ जैसा आचरण होने का प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
योगी सरकार और गौहत्या का वादा
योगी आदित्यनाथ जी और उनकी सरकार सत्ता में आने से पहले बार-बार कहती रही कि:
“गौहत्या पूरी तरह बंद की जाएगी।”
लेकिन आज हकीकत यह है कि:
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गौतस्करी की खबरें आती रहती हैं
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अवैध कत्लखाने पूरी तरह समाप्त नहीं हुए
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और कार्रवाई अक्सर दिखावटी लगती है
अगर 12 साल सत्ता में रहने के बाद भी
यह लक्ष्य पूरा नहीं हुआ, तो जनता पूछ सकती है:क्या धर्म के नाम पर केवल वोट लिया गया?
बाहर साधु, भीतर नीति?
शंकराचार्य जी का संकेत यही है कि
यदि कोई खुद को साधु बताकर सत्ता में आए
और धर्म की मूल भावना पर खरा न उतरे
तो वह कालनेमी जैसा ही आचरण है।यह आरोप नहीं,
आत्ममंथन का निमंत्रण है।केशव प्रसाद मौर्य की तारीफ क्यों जरूरी है?
इस पूरे विवाद में केशव प्रसाद मौर्य जी का यह कहना कि
“विवाद समाप्त होना चाहिए”
कम से कम यह दिखाता है कि सरकार के भीतर
अब भी कुछ लोग हैं जो
धर्म और सत्ता के टकराव को समझते हैं।उनकी यह सोच:
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टकराव नहीं
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समाधान की ओर इशारा करती है।
यह राजनीतिक परिपक्वता का उदाहरण है।
निष्कर्ष
शंकराचार्य जी का सवाल धर्म की आत्मा से जुड़ा है,
और केशव प्रसाद मौर्य जी की टिप्पणी राजनीति की समझदारी से।लेकिन योगी सरकार को यह समझना होगा कि
सनातन धर्म केवल मंच से नारा लगाने से नहीं चलता,
बल्कि कर्म से सिद्ध होता है।यदि वास्तव में सरकार सनातन की रक्षक है,
तो उसे शंकराचार्य जैसे आचार्यों की बातों कोअपमान नहीं, मार्गदर्शन मानना चाहिए।
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